वंदे मातरम : भाग 1

जय हिन्द मित्रों। आज का विषय है हमारा राष्ट्र गीत "वंदे मातरम"।  बंकिम चन्द्र चटटोपाध्याय द्वारा लिखा गया यह गीत, मातृभूमि के गौरव का वर्णन करता है। बहुत ही सरल और  मातृभक्ति से ओतप्रोत इस गीत को नारा बनाकर सरदार भगत सिंह ने क्रांति का बिगुल बजाया था। क्रांतिकारियों को यह गीत उनकी प्राण वाहिनियों में रक्त का संचार करता था। निर्विवाद हमारी संस्कृति में शामिल यह गीत अब विवादित कर दिया गया है। क्योंकी यह गीत एक समुदाय विशेष कि बावनाओ को आहत करता है। इस लेख को आगे बढ़ाने से पहले इस गीत का अर्थ जान लेते हैं।

मातृभूमि की गौरव गाथा को बंकिम चन्द्र चटटोपाध्याय ने वन्दे मातरम में कुछ इस प्रकार किया है।

1.वन्दे मातरम्!
सुजलां सुफलां मलयजशीतलां
शस्यश्यामलां मातरम्!
शुभ-ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम्
फुल्ल-कुसुमित-द्रमुदल शोभिनीम्
सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्!

अर्थ:-  हे माँ मैं तेरी वन्दना करता हूँ
तेरे अच्छे पानी, अच्छे फलों,
सुगन्धित, शुष्क, उत्तरी समीर (हवा)
हरे-भरे खेतों वाली मेरी माँ।
सुन्दर चाँदनी से प्रकाशित रात वाली,
खिले हुए फूलों और घने वृ़क्षों वाली,
सुमधुर भाषा वाली,
सुख देने वाली वरदायिनी मेरी माँ।


2. सन्तकोटिकंठ-कलकल-निनादकराले
द्विसप्तकोटि भुजैर्धृतखरकरबाले
अबला केनो माँ एतो बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदल वारिणीं मातरम्!
तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हरि तुमि कर्म
त्वम् हि प्राणाः शरीरे।
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गड़ि मंदिरें-मंदिरे।

अर्थ:- तीस करोड़ कण्ठों की जोशीली
आवाज़ें,
साठ करोड़ भुजाओं में तलवारों को
धारण किये हुए
क्या इतनी शक्ति के बाद भी,
हे माँ तू निर्बल है,
तू ही हमारी भुजाओं की शक्ति है,
मैं तेरी पद-वन्दना करता हूँ मेरी माँ।
तू ही मेरा ज्ञान, तू ही मेरा धर्म है,
तू ही मेरा अन्तर्मन, तू ही मेरा लक्ष्य,
तू ही मेरे शरीर का प्राण,
तू ही भुजाओं की शक्ति है,
मन के भीतर तेरा ही सत्य है,
तेरी ही मन मोहिनी मूर्ति
एक-एक मन्दिर में।

3. त्वं हि दूर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमल-दल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी नवामि त्वां
नवामि कमलाम् अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्!
वन्दे मातरम्!
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम
धमरणीं भरणीम् मातरम्।

अर्थ:- . तू ही दुर्गा दश सशस्त्र भुजाओं वाली,
तू ही कमला है, कमल के फूलों की बहार,
तू ही ज्ञान गंगा है, परिपूर्ण करने वाली,
मैं तेरा दास हूँ, दासों का भी दास,
दासों के दास का भी दास,
अच्छे पानी अच्छे फलों वाली मेरी माँ,
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।
लहलहाते खेतों वाली, पवित्र, मोहिनी,
सुशोभित, शक्तिशालिनी, अजर-अमर
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।
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अब आप ही विचार कीजिए कि जिस मातृभूमि पर हमने जन्म लिया। उस मातृभूमि की गौरव गीत में कैसे किसी की भावनाएं आहत हो गई?? क्या अपनी मां का गुणगान करना अधर्म है??
अगर ये अधर्म है तो मुझे ये अधर्म करना स्वीकार है। क्योंकी मेरी मां और मातृभूमि से बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं। मातृभूमि का महत्व श्री राम जी ने लक्ष्मण से कुछ कुछ इस तरह कहा है -
"अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। "
अर्थात:- "हे लक्ष्मण ये स्वर्ण की लंका मुझे प्यारी नहीं है। जननी (माता) और जन्मभूमि मुझे स्वर्ग से भी ज्यादा प्यारी है। इसके अतिरिक्त भी कई महापुरुषों के वक्तव्य में मातृभूमि प्रेम सर्वप्रथम रहा है।

मित्रों आरंभ से ही यह गीत विवादों में रहा है सिर्फ और सिर्फ इसीलिए क्योंकी इस गीत में हम अपनी मातृभूमि की तुलना मां दुर्गा के रूप में करते हैं। बस इसी कारण से यह महान गीत राष्ट्र गान नहीं बन पाया। मित्रों वंदे मातरम गीत की कहानी बहुत बड़ी है। ये गीत क्यों बना, कैसे ये राष्ट्र गान नहीं बन पाया। और क्यों इस गीत पर राजनीति होती है ये अगले भाग में विस्तार से जानेंगे।

जय हिन्द जय भारत।

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