मरना ही था सबको
हां मरना ही था सबको। इस पापी दुर्योधन को मरना ही था, जिसने द्रौपदी का अपमान किया। टूटनी ही थी उसकी वो जंघा। जिसे वह पीट पीट कर उस पवित्र सती द्रोपदी को बैठने के लिए कह रहा था। उसका यह हाल होना ही था। उसने समग्र स्त्री जाति का अपमान किया था। फटनी ही थी उस अधर्मी दुशासन की छाती। जिस छाती के अंदर स्थित हृदय में नारी जाती को निर्वस्त्र करने का दुस्साहस हो, उस छाती को आज नहीं तो कल फटना ही था। मरना ही था उस महारथी कर्ण को जिसने एक सती को अपशब्द कहे। कदाचित अगर वह सहस्त्र कवच लेकर भी युद्ध करता तो भी वह पापी द्रोपदी रूपी मां काली से नहीं बच पाता। तो क्या हुआ द्रोणाचार्य अजेय थे। गुरु थे, ब्राह्मण थे, परशुराम शिष्य थे। उनका शीश तो काटना ही था। जो चुपचाप इस अधर्म को देखते रहे, सुनते रहे पर मौन रहे। और पितामह भीष्म की तो क्या कहें जो केवल अपनी प्रतिज्ञा के पालन करने के लिए नारी जाती की अस्मत पर उठने वाले हाथों को रोक नहीं पाए। समर्थ होते हुए भी केवल अपनी की हुईं प्रतिज्ञा में बंधे रहे। परन्तु उस अधर्मी दुर्योधन को रोक नहीं पाए। क्या होता जो उनकी प्रतिज्ञा टूट जाती। एक सती का अपमान तो ना होता...