भीष्म प्रतिज्ञा बनाम कृष्ण प्रतिज्ञा

नमस्कार मित्रों।
पितामह भीष्म के नाम से आप भली- भांती परिचित होंगे। अपने पिता के सुख के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की अखंड प्रतिज्ञा ली थी और साथ में ये प्रतिज्ञा ली की वे कभी राजा नहीं बनेंगे। स्वयं राजा और सिंहासन के अधीन रहेंगे। बहुत ही भीषण प्रतिज्ञा थी। भीष्म की इस पित्र भक्ति से प्रसन्न होकर उनके पिता महाराज शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। इसी प्रतिज्ञा के कारण महाभारत हुआ। क्युकी वो राजा और सिंहासन के अधीन थे इसलिए वे कौरवों के हर अनुचित कार्य का केवल विरोध ही कर सकते थे। उन्होंने इतना अधर्म होने दिया। वरनाव्रत का अग्निकांड हो या भीम को जहर देकर मार ना हो, द्यूत क्रीड़ा में छल हो या द्रोपदी वस्त्र हरण हो। उन्होंने केवल विरोध ही किया। वो ये भूल गए थे कि धर्म से बड़ी कोई प्रतिज्ञा नहीं है। अपनी स्वयं की प्रतिज्ञा का बोझ उठाकर अधर्म रूपी दुर्योधन और धृतराष्ट्र का पक्ष लेने के लिए विवश थे।

अब ये बात भी सभी जानते हैं कि वासुदेव कृष्ण जों की अर्जुन के सारथी थे, उन्होंने भी एक प्रतिज्ञा ली थी कि वे इस युद्ध में शस्त्रों नहीं उठाएंगे। वे केवल सारथी बनकर रहेंगे।

युद्ध आरंभ होता है। भीष्म और अर्जुन का सामना होता है।  भीष्म अर्जुन को लगभग पराजित ही कर देते है और साथ ही कृष्ण को भी ललकारते हैं। अपने प्रिय अर्जुन की दशा देख कर वासुदेव श्री कृष्ण रथ से कूद कर पहिया उठा लेते हैं। और देखते ही देखते वो पहिया चक्र बन जाता है। और वे भीष्म को मारने के लिए दौड़ते हैं। तब अर्जुन श्री कृष्ण के पैर पकड़ लेते हैं और साथ ही भीष्म का वध करने का वचन भी देते हैं। तब भीष्म और कृष्ण का संवाद होता है।
जो बहुत ही रोचक है।

भीष्म : प्रणाम वासुदेव आज मैने आपसे आपकी शस्त्र ना उठाने की प्रतिज्ञा भंग करवा दी।

कृष्ण : है पितामह। मैने शस्त्र नहीं उठाया, मैने रथ का पहिया उठाया है।

भीष्म : मुस्कुराते हुए। वासुदेव क्या मैं  आपकी लीलाओं से परिचित नहीं हूं क्या? फिर भी आप तो भगवान है। आप कुछ भी कर सकते हैं ।

कृष्ण : है गंगापुत्र। अर्जुन धर्म के पक्ष में युद्ध कर रहा है। और आप भली-भांति जानते हैं कि आप अधर्म के पक्ष में युद्ध कर रहे हैं। और धर्म की विजय के लिए मैं कोई भी प्रतिज्ञा बंद कर सकता हूं। क्योंकि मेरी प्रतिज्ञा धर्म से बड़ी नहीं है।

इसके बाद भीष्म भी समझ गए कि वासुदेव कृष्ण उनकी प्रतिज्ञा के संदर्भ में ये बात के रहें हैं। और वो ये भी समझ गए कि उनको अब इस युद्ध से हटना ही होगा क्युकी वे जानते थे अगर में अर्जुन को परास्त भी कर देता हूं तो भी श्री कृष्ण मुझे पराजित करके ही रहेंगे।

और कुछ समय बाद ही अर्जुन ने भीष्म को परास्त किया।

और वासुदेव कृष्ण ने विश्व को एक सबक दिया कि धर्म से बड़ा कुछ नहीं। स्वयं भगवान भी धर्म के आगे स्वयं की प्रतिज्ञा भी भंग कर सकते हैं।

जय श्री कृष्णा।

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