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प्रकृति

 हर जगह फैली अस्थिरता, निराशा, नकारात्मकता, आजीविका के लिए संघर्ष, महामारी से त्रस्त त्राहि त्राहि करता संसार, प्राणवायु की कमी। कुल मिलाकर यह कह सकते है अभी जीवन के लिए संघर्ष हो रहा है। जो रोगी है वह जीने के लिए संघर्ष कर रहा है और जो रोगी नही है वह रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। कभी सोचा है ऐसा समय क्यों आया है? क्या ईश्वर में दया भाव नहीं है? क्या ईश्वर ने यह सब करवाया है? उत्तर मिलेगा नही, क्युकी यह महामारी इंसान के स्वार्थ और महत्वकांक्षा से उत्पन्न है। हम हमारी संस्कृति के विमुख होकर आधुनिकता में प्रवेश तो कर गए लेकिन उस आधुनिकता ने हमारे जीवन की ही जड़े काटना प्रारंभ कर दी है। जरा सोचिए आपको अब तक क्या प्राप्त हुआ है। क्या आप संतुष्ट है। नहीं आप नही है। चाहे आप थोड़ा कमाए या बहुत अधिक कमाए, परंतु एक चीज आप अभी तक नही कमा पा रहे वो है संतुष्टि। ये संतुष्टि पाने के लिए व्यक्ति लगा हुआ है कई दशकों से परंतु अभी तक ये संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई, इसका क्या कारण है? कभी सोचा है। हम इस परम शक्ति के विमुख होकर बहुत कुछ हासिल तो कर लिए पर अभी भी सबसे सुंदर चीज हासिल नहीं कर पाए, वो सच्...

मरना ही था सबको

हां मरना ही था सबको। इस पापी दुर्योधन को मरना ही था, जिसने द्रौपदी का अपमान किया। टूटनी ही थी उसकी वो जंघा। जिसे वह पीट पीट कर उस पवित्र सती द्रोपदी को बैठने के लिए कह रहा था। उसका यह हाल होना ही था। उसने समग्र स्त्री जाति का अपमान किया था। फटनी ही थी उस अधर्मी दुशासन की छाती। जिस छाती के अंदर स्थित हृदय में नारी जाती को निर्वस्त्र करने का दुस्साहस हो, उस छाती को आज नहीं तो कल फटना ही था। मरना ही था उस महारथी कर्ण को जिसने एक सती को अपशब्द कहे। कदाचित अगर वह सहस्त्र कवच लेकर भी युद्ध करता तो भी वह पापी द्रोपदी रूपी मां काली से नहीं बच पाता। तो क्या हुआ द्रोणाचार्य अजेय थे। गुरु थे, ब्राह्मण थे, परशुराम शिष्य थे। उनका शीश तो काटना ही था। जो चुपचाप इस अधर्म को देखते रहे, सुनते रहे पर मौन रहे। और पितामह भीष्म की तो क्या कहें जो केवल अपनी प्रतिज्ञा के पालन करने के लिए नारी जाती की अस्मत पर उठने वाले हाथों को रोक नहीं पाए। समर्थ होते हुए भी केवल अपनी की हुईं प्रतिज्ञा में बंधे रहे। परन्तु उस अधर्मी दुर्योधन को रोक नहीं पाए। क्या होता जो उनकी प्रतिज्ञा टूट जाती। एक सती का अपमान तो ना होता...

मुरलीधर या चक्रधर

विधाता की लीला अपरम्पार है। आदिकाल से ही पृथ्वी श्री हरि और शिव जी की लीला का केंद्र रही है। जब जब पृथ्वी पर अत्याचार बड़ा, तब तब श्री हरि ने अवतार लेकर धर्म की रक्षा की है। हर युग में हरि ने मानवीय मूल्यों की रक्षार्थ समय समय पर अवतार लिया है। ऐसा ही एक अवतार है पर्मावतार श्री कृष्ण का। कृष्ण का नाम सुनते ही मस्तिष्क में हृदय में सर्वप्रथम मुरली, वृंदावन, राधा, गोपियां, माखन, मैया यशोदा, रासलीला आदि विचार उत्पन्न होते हैं। आज भी कोई बालक कृष्ण की पोशाक भी पहनता है तो मुरली और मोरपंख से पहचाना जाता है। ना की सुदर्शन चक्र से। क्युकी कृष्ण = प्रेम है और प्रेम= कृष्ण है। फिर क्यों वह प्रेम रूपी कृष्ण महाभारत होने देते हैं? क्यों ईश्वर होते हुए भी कृष्ण ये युद्ध रोक नहीं पाए। अब यहां पर कृष्ण के कई रूप है। मुरलीधर प्रेम का प्रतीक। सुदर्शन धारी कृष्ण। सारथी कृष्ण। शांति दूत कृष्ण। यहां कृष्ण कई भूमिकाओं में है। आप किस कृष्ण के पक्ष में हैं। वह कृष्ण जिसे संसार की कोई चिंता नहीं वो तो ब्रजमंडल में अपनी लीलाओं में व्यस्त है। दूसरा वह कृष्ण जो महाभारत की सक्रिय राजनीति को नया आयाम प्रधान करत...

भक्त, भगवान और अभिमान

भगवान समय समय पर भक्तों का उद्धार तो करते ही हैं परन्तु साथ साथ भक्तों के अभिमान को भी इस प्रकार से नष्ट करते हैं कि पुनः उनमें अभिमान के स्थान पर निश्छल भक्ति भावना के अतिरिक्त और कुछ ना रहे। ऐसे ही एक बार श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा, वाहन गरुड़ और उनके अमोघ अस्त्र सुदर्शन चक्र का अभिमान मर्दन किया था। **** *सत्य भामा को ये अभिमान था कि कृष्ण की सभी पटरानियों में सर्वाधिक सुंदर में हूं। *गरुड़ को उनकी एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ने की तीव्र गति और बल पर अभिमान था। *सुदर्शन चक्र को शक्ति शाली और अचूक अस्त्र होने का अभिमान था। एक दिन प्रभु ने इन तीनों के अभिमान को तोड़ने के लिए मन ही मन एक योजना बनाई और सर्वप्रथम गरुड़ को आदेश दिया कि हिमालय पर्वत पर हनुमान जी तपस्यारत है। उन्हें जाकर लेे आओ। सुदर्शन से कहा आज तुम बाहर पहरा दो तथा किसी अनजान को अंदर मत आने देना। सत्यभामा जी से कहा आज हनुमान जी आने वाले हैं तुम शीघ्र ही उनके आने की तैयारी करो। इस प्रकार सर्वप्रथम गरुड़ हनुमान जी के पास जाकर कहते हैं कि आपको प्रभु ने द्वारका शीघ्र आने का निमंत्रण भेजा है। और गरुड...

भीष्म प्रतिज्ञा बनाम कृष्ण प्रतिज्ञा

नमस्कार मित्रों। पितामह भीष्म के नाम से आप भली- भांती परिचित होंगे। अपने पिता के सुख के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की अखंड प्रतिज्ञा ली थी और साथ में ये प्रतिज्ञा ली की वे कभी राजा नहीं बनेंगे। स्वयं राजा और सिंहासन के अधीन रहेंगे। बहुत ही भीषण प्रतिज्ञा थी। भीष्म की इस पित्र भक्ति से प्रसन्न होकर उनके पिता महाराज शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। इसी प्रतिज्ञा के कारण महाभारत हुआ। क्युकी वो राजा और सिंहासन के अधीन थे इसलिए वे कौरवों के हर अनुचित कार्य का केवल विरोध ही कर सकते थे। उन्होंने इतना अधर्म होने दिया। वरनाव्रत का अग्निकांड हो या भीम को जहर देकर मार ना हो, द्यूत क्रीड़ा में छल हो या द्रोपदी वस्त्र हरण हो। उन्होंने केवल विरोध ही किया। वो ये भूल गए थे कि धर्म से बड़ी कोई प्रतिज्ञा नहीं है। अपनी स्वयं की प्रतिज्ञा का बोझ उठाकर अधर्म रूपी दुर्योधन और धृतराष्ट्र का पक्ष लेने के लिए विवश थे। अब ये बात भी सभी जानते हैं कि वासुदेव कृष्ण जों की अर्जुन के सारथी थे, उन्होंने भी एक प्रतिज्ञा ली थी कि वे इस युद्ध में शस्त्रों नहीं उठाएंगे। वे केवल सारथी बनकर रहेंगे। ...

सनातन दर्शन- गणेश जी

नमस्कार मित्रों। बहुत समय से एक बहस छिड़ी हुई है भगवान श्री गणेश जी के सिर के ऊपर। कई समझदार लोग कहते हैं कि शिव जी तो भगवान थे उसके बाद भी शिव जी ने हाथी का सिर ही क्यों लगाया। और कई बुद्धिजीवी लोग सनातन धर्म का मज़ाक उड़ा रहे हैं। गलती उनकी नहीं है गलती उनके अधूरे ज्ञान की है। अगर उन्होंने इस बारे में विस्तार से पड़ा या समझा होता तो इस प्रकार के कुतर्क नहीं करते। और गलती हमारी भी है क्युकी हम भी अपने अधूरे ज्ञान के कारण इन जैसे अज्ञानी लोगों को जवाब नहीं दे पाते। चलिए अब मैं बताता हूं श्री गणेश जी के गजमुख होने का रहस्य। एक समय की बात है ऋषि दुर्वासा ने नारायण से प्राप्त किया हुआ ज्ञान और बुद्धि रूपी कमल का पुष्प मार्ग में जाते हुए देवराज इन्द्र को दे दिया। इन्द्र ने उस कमल को हाथी के मस्तक पर रख दिया। फलस्वरूप उस हाथी में ज्ञान और बुद्धि का संचार हुआ। ज्ञान और बुद्धि के आते ही वह हाथी मन ही मन में भगवान शिव की उपासना करने लगा। और ऐसा करते हुए उस हाथी ने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया। बहुत वर्ष उसने शिव उपासना में निकाल दिए। एक दिन भोलेनाथ प्रसन्न हुए और हाथी के पास जा पहुंचे द...

वंदे मातरम : भाग 2

जय हिन्द मित्रों। वंदे मातरम गीत की यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। जब हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। तो ब्रिटिश हुकूमत ने सरकारी समारोह में "save the queen" गीत को गाना अनिवार्य कर दिया। क्योंकि ब्रिटिश राज में queen अर्थात् रानी का शासन होता था। और इस गीत में रानी की दीर्घायु के लिए प्रार्थना होती थी। यह घटना ब्रिटिश राज के एक सरकारी अधिकारी के हृदय पर प्रहार कर गई। और वह सरकारी अधिकारी कोई और नहीं, *बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय* थे। उन्होंने इस इस गीत के विकल्प में एक नए गीत की रचना की। इस गीत की रचना उन्होंने संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से की। और यह गीत सर्वप्रथम उनके ही लिखे गए उपन्यास *आनंद मठ में* उन्होंने शामिल किया। यह बांग्ला उपन्यास जमींदारों और अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों से त्रस्त होकर उठ खड़े हुए सन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस उपन्यास में   *भवानंद* नामक एक सन्यासी विद्रोही इस गीत को गाता है। मित्रों फिर यह गीत हर देशप्रेमी की जुबां पर चढ गया। स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत ने निर्णायक भूमिका निभाई। हर क्रांतिकारी इस गीत से जुड़ गया। यह गीत ब्रिटिश ह...