प्रकृति
हर जगह फैली अस्थिरता, निराशा, नकारात्मकता, आजीविका के लिए संघर्ष, महामारी से त्रस्त त्राहि त्राहि करता संसार, प्राणवायु की कमी। कुल मिलाकर यह कह सकते है अभी जीवन के लिए संघर्ष हो रहा है। जो रोगी है वह जीने के लिए संघर्ष कर रहा है और जो रोगी नही है वह रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। कभी सोचा है ऐसा समय क्यों आया है? क्या ईश्वर में दया भाव नहीं है? क्या ईश्वर ने यह सब करवाया है? उत्तर मिलेगा नही, क्युकी यह महामारी इंसान के स्वार्थ और महत्वकांक्षा से उत्पन्न है। हम हमारी संस्कृति के विमुख होकर आधुनिकता में प्रवेश तो कर गए लेकिन उस आधुनिकता ने हमारे जीवन की ही जड़े काटना प्रारंभ कर दी है। जरा सोचिए आपको अब तक क्या प्राप्त हुआ है। क्या आप संतुष्ट है। नहीं आप नही है। चाहे आप थोड़ा कमाए या बहुत अधिक कमाए, परंतु एक चीज आप अभी तक नही कमा पा रहे वो है संतुष्टि। ये संतुष्टि पाने के लिए व्यक्ति लगा हुआ है कई दशकों से परंतु अभी तक ये संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई, इसका क्या कारण है? कभी सोचा है। हम इस परम शक्ति के विमुख होकर बहुत कुछ हासिल तो कर लिए पर अभी भी सबसे सुंदर चीज हासिल नहीं कर पाए, वो सच्चा सुख हासिल नहीं कर पाए जिस से मन को शांति मिले, कुछ ना होकर भी व्यक्ति मन से समृद्ध रहे वहा परम सुख का अभी तक प्रत्येक के जीवन में अभाव है। जरा खुद सोचिए इस प्रकृति ने आपको क्या क्या दिया है। और आपने प्रकृति को क्या दिया है। माफ कीजिएगा। कुछ नही दिया है उसके विपरीत हमने प्रकृति का दोहन ही किया है। मेरा लेख हर व्यक्ति के समझ में नहीं आएगा लेकिन है जो समझेगा वो शायद दूसरों को भी समझाएगा। कहते है हमेशा सकारात्मक बोलना चाहिए चलो में कुछ बोलता हूं। चलो पेड़ लगाते हैं। अब देखते है कोन यह सकारात्मक पहल करता है। ये एक छोटा सा उपहार इस प्रकृति को कोन कोन देगा?????
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