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Showing posts from January, 2019

वंदे मातरम : भाग 2

जय हिन्द मित्रों। वंदे मातरम गीत की यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। जब हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। तो ब्रिटिश हुकूमत ने सरकारी समारोह में "save the queen" गीत को गाना अनिवार्य कर दिया। क्योंकि ब्रिटिश राज में queen अर्थात् रानी का शासन होता था। और इस गीत में रानी की दीर्घायु के लिए प्रार्थना होती थी। यह घटना ब्रिटिश राज के एक सरकारी अधिकारी के हृदय पर प्रहार कर गई। और वह सरकारी अधिकारी कोई और नहीं, *बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय* थे। उन्होंने इस इस गीत के विकल्प में एक नए गीत की रचना की। इस गीत की रचना उन्होंने संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से की। और यह गीत सर्वप्रथम उनके ही लिखे गए उपन्यास *आनंद मठ में* उन्होंने शामिल किया। यह बांग्ला उपन्यास जमींदारों और अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों से त्रस्त होकर उठ खड़े हुए सन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस उपन्यास में   *भवानंद* नामक एक सन्यासी विद्रोही इस गीत को गाता है। मित्रों फिर यह गीत हर देशप्रेमी की जुबां पर चढ गया। स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत ने निर्णायक भूमिका निभाई। हर क्रांतिकारी इस गीत से जुड़ गया। यह गीत ब्रिटिश ह...

वंदे मातरम : भाग 1

जय हिन्द मित्रों। आज का विषय है हमारा राष्ट्र गीत "वंदे मातरम"।  बंकिम चन्द्र चटटोपाध्याय द्वारा लिखा गया यह गीत, मातृभूमि के गौरव का वर्णन करता है। बहुत ही सरल और  मातृभक्ति से ओतप्रोत इस गीत को नारा बनाकर सरदार भगत सिंह ने क्रांति का बिगुल बजाया था। क्रांतिकारियों को यह गीत उनकी प्राण वाहिनियों में रक्त का संचार करता था। निर्विवाद हमारी संस्कृति में शामिल यह गीत अब विवादित कर दिया गया है। क्योंकी यह गीत एक समुदाय विशेष कि बावनाओ को आहत करता है। इस लेख को आगे बढ़ाने से पहले इस गीत का अर्थ जान लेते हैं। मातृभूमि की गौरव गाथा को बंकिम चन्द्र चटटोपाध्याय ने वन्दे मातरम में कुछ इस प्रकार किया है। 1.वन्दे मातरम्! सुजलां सुफलां मलयजशीतलां शस्यश्यामलां मातरम्! शुभ-ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम् फुल्ल-कुसुमित-द्रमुदल शोभिनीम् सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम् सुखदां वरदां मातरम्! अर्थ:-  हे माँ मैं तेरी वन्दना करता हूँ तेरे अच्छे पानी, अच्छे फलों, सुगन्धित, शुष्क, उत्तरी समीर (हवा) हरे-भरे खेतों वाली मेरी माँ। सुन्दर चाँदनी से प्रकाशित रात वाली, खिले हुए फूलों और घने वृ़क्षो...

वर्ण व्यवस्था बनाम जातिवाद

नमस्कार मैं भारत हूं। मेरी कोई जाती नहीं है। मेरी एक ही जाति है मानवता। मेरा एक ही धर्म है मानवता। वैदिक काल में मेरे वर्ण जरूर हुआ करते थे। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र। जो कि कर्म के अनुसार होते थे ना की जन्म के अनुसार। इसके कई उदाहरण है। जैसे महर्षि वाल्मीकि जो की आज के समयानुसार दलित थे परन्तु उस काल में वो महा ऋषि थे। जिन्होंने रामायण की रचना की थी। ऐसे कई उदाहरण है जैसे ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। परन्तु ऐसा था नहीं क्योंकी उन्होंने ब्राह्मण वर्ण को चुना तो वे ब्राह्मण ही कहलाए। इससे यह सिद्ध होता है कि जातिवाद वैदिक धर्म की देन नहीं है।  है। ऐसे ही परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय थे। और महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे जो बाद में ब्राह्मण बने। ऐसे कई उदाहरण है जिनसे ये सिद्ध होता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था कर्मो के आधार पर थी ना की जन्म के आधार पर।  ‎ये जाती व्यवस्था मनुष्यों की बनाई हुई है। वैदिक धर्म...

धर्म बनाम धर्म

नमस्कार। मै भारत हूं। मेरा धर्म है मानवता। मेरा धर्म है क्षमा। मेरा धर्म है सभी धर्मों का सम्मान। मेरा धर्म है जीवों पर दया। मेरा धर्म है शरणागत की रक्षा। मेरा धर्म है मातृभूमि की रक्षा। मेरा धर्म है एकता और समरसता। मेरा धर्म है धर्म की रक्षा करना। मेरा धर्म है स्त्रियों का सम्मान करना। मेरा धर्म है निर्बलों की रक्षा करना। और मेरा धर्म है कि धर्म के विरूद्ध कोई अपना व्यक्ति ही क्यों ना हो, उसके भी विरूद्ध हो जाना।अब ये बताईए भारत वासियों आपका धर्म क्या है।?? क्षमा करना परन्तु आपको शायद धर्म के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। क्योंकि किसी भी ईश्वरीय शक्ति और सत्ता को मानना ही धर्म नहीं है। अगर आपकी ईश्वर में श्रृद्धा है तो ईश्वर द्वारा बताए गए धर्म में भी उतनी ही श्रद्धा होनी चाहिए, विश्वास होना चाहिए? सिर्फ ईश्वरीय सत्ता की स्वीकारोक्ति धर्म ही धर्म नहीं है। धर्म का वर्णन में उपर की पंक्तियों में कर चुका हूं। उदाहरण के लिए रावण भी शिवभक्त था, शिव जी की सत्ता को मानता था। तो इसका तात्पर्य ये नहीं हुआ कि वो धर्मी था। माता सीता का अपहरण ही उसके पतन का कारण बना क्योंकि उसने धर्म की सारी...

विश्व गुरु की व्यथा

नमस्कार मैं भारत हूं। मेरा कभी विश्व पर शासन हुआ करता था। मैं वहीं भारत हुं    जिसे विश्वगुरु की उपाधि प्राप्त थी। वही भारत जिसमें कई महापुरुषों, ऋषियों, मनीषियों, शूरवीरों, देशभक्तों, वीरांगनाओं ने जन्म लिया। मैं वहीं भारत हूं जिसे वेदों का ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। पुरातन और प्राचीन वैदिक धर्म की आधार शिला का साक्षी मैं ही हूं। मैं वही भारत हूं जिसमें सभ्यता सबसे पहले अंकुरित और विकसित हुईं। और उसी सभ्यता को आधार मानकर विश्व बना। मैं वहीं भारत हूं जिसने पूरे विश्व को ज्ञान का अमृत प्रधान किया और जिसकी ज्ञान कि परिधि में पूरा विश्व पनपा। मैं वहीं भारत हूं जिसमें कला सर्वप्रथम जन्मी। कई युगों का साक्षी मैं वहीं भारत हुं जिसने सूर्यवंशी राजाओं का तेज देखा है, जिनके तेज के आगे आकाश में विराजमान सूर्य का तेज भी मंद हो जाता था। ऋषियों और तपस्वियों के ओंकार के नाद से पूरी पृथ्वी को शुद्ध और सरस होते देखा है मैंने। मैने स्वर्ग से भी सुंदर राम का राम राज्य देखा है और कृष्ण की नीति देखी है। वह नीति जिसने भारत में धर्म की स्थापना की। अति गौरवशाली इतिहास का साक्षी हूं मैं। ...