वर्ण व्यवस्था बनाम जातिवाद
नमस्कार मैं भारत हूं। मेरी कोई जाती नहीं है। मेरी एक ही जाति है मानवता। मेरा एक ही धर्म है मानवता। वैदिक काल में मेरे वर्ण जरूर हुआ करते थे। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र। जो कि कर्म के अनुसार होते थे ना की जन्म के अनुसार। इसके कई उदाहरण है। जैसे महर्षि वाल्मीकि जो की आज के समयानुसार दलित थे परन्तु उस काल में वो महा ऋषि थे। जिन्होंने रामायण की रचना की थी। ऐसे कई उदाहरण है जैसे ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। परन्तु ऐसा था नहीं क्योंकी उन्होंने ब्राह्मण वर्ण को चुना तो वे ब्राह्मण ही कहलाए। इससे यह सिद्ध होता है कि जातिवाद वैदिक धर्म की देन नहीं है।
है। ऐसे ही परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय थे। और महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे जो बाद में ब्राह्मण बने। ऐसे कई उदाहरण है जिनसे ये सिद्ध होता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था कर्मो के आधार पर थी ना की जन्म के आधार पर।
ये जाती व्यवस्था मनुष्यों की बनाई हुई है। वैदिक धर्म की नहीं। और ना की किसी धार्मिक पुस्तक या ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता है। इस तरह की मानसिकता केवल मनुष्यों की चर्म में छिपे राक्षसों की ही हो सकती है। जिन्होंने वैदिक वर्ण व्यवस्था को जातिवाद का रूप से दिया। ये अवधारणा भारत और वैदिक धर्म की नहीं हो सकती। क्योंकि भारत और वैदिक धर्म का सिद्धांत ही "वसुदेव कुटुंबकम" है।
भारत में सबको अपना वर्ण चुनने की स्वतंत्रता थी और अभी भी है। इसलिए वैदिक धर्म के ऊपर आक्षेप और आरोप लगाने से पूर्व आप वेदों का अध्ययन कीजिए। और भारतीयों से मेरा अनुरोध है कृपया आप सब इस जात पात भेदभाव से ऊपर उठकर सोचिए और स्वयं विचार कीजिए कि जातियों में फंसकर क्या आपका उद्धार हो सकता है? क्या आपकी आनेवाली पीढ़ियों का भला हो सकता है। नहीं हो सकता अगर आप अभी नहीं संभले तो आप खुद आपके पतन के जिम्मेदार होंगे। इसलिए वक्त है संभल जाइए। इतिहास से कुछ सीखिए। कैसे जब जातिवाद में फंसकर विदेशियों के अधीन हुए थे। कैसे मुगलों ने और फिर अंग्रेजों ने लूटा। कैसे भारत को खंड खंड किया। स्वतंत्रता भी भारत के टुकड़े होने के बाद मिली। दशकों की त्रासदी भोग के स्वतंत्रता पाई। परन्तु लाखों लोगों के बलिदान के बाद मिली स्वतंत्रता किं कीमत भी नहीं जानी। स्वयं विचार कीजिए कि आप किस मार्ग पर चल पड़े हैं?एक ओर एकता, समरसता और एक अखंडता है। वहीं दूसरी ओर जातिवाद, विभाजन, विघटन है। अब मार्ग आपको चुनना है की आप कोनसा मार्ग चुनते हैं। एक बात अवश्य ध्यान रखना कि मनुष्यता और भारतीयता के अतिरिक्त आपकी दूसरी कोई जाती नहीं है।
।। सं गच्छध्वम् सं वदध्वम्।। (ऋग्वेद 10.181.2)
है। ऐसे ही परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय थे। और महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे जो बाद में ब्राह्मण बने। ऐसे कई उदाहरण है जिनसे ये सिद्ध होता है कि भारत में वर्ण व्यवस्था कर्मो के आधार पर थी ना की जन्म के आधार पर।
ये जाती व्यवस्था मनुष्यों की बनाई हुई है। वैदिक धर्म की नहीं। और ना की किसी धार्मिक पुस्तक या ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता है। इस तरह की मानसिकता केवल मनुष्यों की चर्म में छिपे राक्षसों की ही हो सकती है। जिन्होंने वैदिक वर्ण व्यवस्था को जातिवाद का रूप से दिया। ये अवधारणा भारत और वैदिक धर्म की नहीं हो सकती। क्योंकि भारत और वैदिक धर्म का सिद्धांत ही "वसुदेव कुटुंबकम" है।
भारत में सबको अपना वर्ण चुनने की स्वतंत्रता थी और अभी भी है। इसलिए वैदिक धर्म के ऊपर आक्षेप और आरोप लगाने से पूर्व आप वेदों का अध्ययन कीजिए। और भारतीयों से मेरा अनुरोध है कृपया आप सब इस जात पात भेदभाव से ऊपर उठकर सोचिए और स्वयं विचार कीजिए कि जातियों में फंसकर क्या आपका उद्धार हो सकता है? क्या आपकी आनेवाली पीढ़ियों का भला हो सकता है। नहीं हो सकता अगर आप अभी नहीं संभले तो आप खुद आपके पतन के जिम्मेदार होंगे। इसलिए वक्त है संभल जाइए। इतिहास से कुछ सीखिए। कैसे जब जातिवाद में फंसकर विदेशियों के अधीन हुए थे। कैसे मुगलों ने और फिर अंग्रेजों ने लूटा। कैसे भारत को खंड खंड किया। स्वतंत्रता भी भारत के टुकड़े होने के बाद मिली। दशकों की त्रासदी भोग के स्वतंत्रता पाई। परन्तु लाखों लोगों के बलिदान के बाद मिली स्वतंत्रता किं कीमत भी नहीं जानी। स्वयं विचार कीजिए कि आप किस मार्ग पर चल पड़े हैं?एक ओर एकता, समरसता और एक अखंडता है। वहीं दूसरी ओर जातिवाद, विभाजन, विघटन है। अब मार्ग आपको चुनना है की आप कोनसा मार्ग चुनते हैं। एक बात अवश्य ध्यान रखना कि मनुष्यता और भारतीयता के अतिरिक्त आपकी दूसरी कोई जाती नहीं है।
।। सं गच्छध्वम् सं वदध्वम्।। (ऋग्वेद 10.181.2)
अर्थात: साथ चलें मिलकर बोलें। उसी सनातन मार्ग का अनुसरण करो जिस पर पूर्वज चले हैं।
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