सनातन दर्शन- गणेश जी
नमस्कार मित्रों।
बहुत समय से एक बहस छिड़ी हुई है भगवान श्री गणेश जी के सिर के ऊपर। कई समझदार लोग कहते हैं कि शिव जी तो भगवान थे उसके बाद भी शिव जी ने हाथी का सिर ही क्यों लगाया। और कई बुद्धिजीवी लोग सनातन धर्म का मज़ाक उड़ा रहे हैं। गलती उनकी नहीं है गलती उनके अधूरे ज्ञान की है। अगर उन्होंने इस बारे में विस्तार से पड़ा या समझा होता तो इस प्रकार के कुतर्क नहीं करते। और गलती हमारी भी है क्युकी हम भी अपने अधूरे ज्ञान के कारण इन जैसे अज्ञानी लोगों को जवाब नहीं दे पाते। चलिए अब मैं बताता हूं श्री गणेश जी के गजमुख होने का रहस्य।
एक समय की बात है ऋषि दुर्वासा ने नारायण से प्राप्त किया हुआ ज्ञान और बुद्धि रूपी कमल का पुष्प मार्ग में जाते हुए देवराज इन्द्र को दे दिया। इन्द्र ने उस कमल को हाथी के मस्तक पर रख दिया। फलस्वरूप उस हाथी में ज्ञान और बुद्धि का संचार हुआ। ज्ञान और बुद्धि के आते ही वह हाथी मन ही मन में भगवान शिव की उपासना करने लगा। और ऐसा करते हुए उस हाथी ने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया। बहुत वर्ष उसने शिव उपासना में निकाल दिए। एक दिन भोलेनाथ प्रसन्न हुए और हाथी के पास जा पहुंचे दर्शन देने। तब हाथी ने भगवान से प्रार्थना की हे प्रभु मेरी बुद्धि और ज्ञान का कभी अंत ना हो। तब शिवजी तथास्तु बोल कर अन्तर्ध्यान हो गए।
कालांतर में इसी हाथी के मस्तक को गणेश जी को लगाया गया। क्युकी जो बुद्धि और ज्ञान उस हाथी में था वो विश्व में अन्यत्र किसी के पास भी नहीं था। महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी की सहायता से महाभारत जैसे काव्य की रचना की। क्यूंकि बुध्दिबल में गणेश जी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं टिकता।
गणपति बप्पा मोरिया।
बहुत समय से एक बहस छिड़ी हुई है भगवान श्री गणेश जी के सिर के ऊपर। कई समझदार लोग कहते हैं कि शिव जी तो भगवान थे उसके बाद भी शिव जी ने हाथी का सिर ही क्यों लगाया। और कई बुद्धिजीवी लोग सनातन धर्म का मज़ाक उड़ा रहे हैं। गलती उनकी नहीं है गलती उनके अधूरे ज्ञान की है। अगर उन्होंने इस बारे में विस्तार से पड़ा या समझा होता तो इस प्रकार के कुतर्क नहीं करते। और गलती हमारी भी है क्युकी हम भी अपने अधूरे ज्ञान के कारण इन जैसे अज्ञानी लोगों को जवाब नहीं दे पाते। चलिए अब मैं बताता हूं श्री गणेश जी के गजमुख होने का रहस्य।
एक समय की बात है ऋषि दुर्वासा ने नारायण से प्राप्त किया हुआ ज्ञान और बुद्धि रूपी कमल का पुष्प मार्ग में जाते हुए देवराज इन्द्र को दे दिया। इन्द्र ने उस कमल को हाथी के मस्तक पर रख दिया। फलस्वरूप उस हाथी में ज्ञान और बुद्धि का संचार हुआ। ज्ञान और बुद्धि के आते ही वह हाथी मन ही मन में भगवान शिव की उपासना करने लगा। और ऐसा करते हुए उस हाथी ने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया। बहुत वर्ष उसने शिव उपासना में निकाल दिए। एक दिन भोलेनाथ प्रसन्न हुए और हाथी के पास जा पहुंचे दर्शन देने। तब हाथी ने भगवान से प्रार्थना की हे प्रभु मेरी बुद्धि और ज्ञान का कभी अंत ना हो। तब शिवजी तथास्तु बोल कर अन्तर्ध्यान हो गए।
कालांतर में इसी हाथी के मस्तक को गणेश जी को लगाया गया। क्युकी जो बुद्धि और ज्ञान उस हाथी में था वो विश्व में अन्यत्र किसी के पास भी नहीं था। महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी की सहायता से महाभारत जैसे काव्य की रचना की। क्यूंकि बुध्दिबल में गणेश जी के अतिरिक्त और कोई भी नहीं टिकता।
गणपति बप्पा मोरिया।
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