धर्म बनाम धर्म
नमस्कार। मै भारत हूं।
मेरा धर्म है मानवता। मेरा धर्म है क्षमा। मेरा धर्म है सभी धर्मों का सम्मान। मेरा धर्म है जीवों पर दया। मेरा धर्म है शरणागत की रक्षा। मेरा धर्म है मातृभूमि की रक्षा। मेरा धर्म है एकता और समरसता। मेरा धर्म है धर्म की रक्षा करना। मेरा धर्म है स्त्रियों का सम्मान करना। मेरा धर्म है निर्बलों की रक्षा करना। और मेरा धर्म है कि धर्म के विरूद्ध कोई अपना व्यक्ति ही क्यों ना हो, उसके भी विरूद्ध हो जाना।अब ये बताईए भारत वासियों आपका धर्म क्या है।??
क्षमा करना परन्तु आपको शायद धर्म के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। क्योंकि किसी भी ईश्वरीय शक्ति और सत्ता को मानना ही धर्म नहीं है। अगर आपकी ईश्वर में श्रृद्धा है तो ईश्वर द्वारा बताए गए धर्म में भी उतनी ही श्रद्धा होनी चाहिए, विश्वास होना चाहिए? सिर्फ ईश्वरीय सत्ता की स्वीकारोक्ति धर्म ही धर्म नहीं है। धर्म का वर्णन में उपर की पंक्तियों में कर चुका हूं। उदाहरण के लिए रावण भी शिवभक्त था, शिव जी की सत्ता को मानता था। तो इसका तात्पर्य ये नहीं हुआ कि वो धर्मी था। माता सीता का अपहरण ही उसके पतन का कारण बना क्योंकि उसने धर्म की सारी सीमाएं तोड़ दी एक पतिव्रता स्त्री का अपहरण करके। और त्रिलोक विजयी करने वाले शक्तिशाली रावण का भी अंत हुआ। क्युकी उसने धर्म के विरूद्ध आचरण किया। शायद अब आप धर्म की परिभाषा समझ गए होंगे। अब बताईए धर्म की परिभाषा क्या है जातिवाद में फसे भारत वासियों। आप किसे धर्म कहते हो?? आप धर्म उस कहते हो जिसको आपने कई जातियों में बांट रखा है?? ये भूल गए आप की धर्म हमेशा एक जुटता और समरसता का संदेश देता है। क्या आपने इसे कभी माना या समझा। क्या आपने धर्म का मर्म समझा?? नहीं समझा आपने धर्म को। और जातियां सूचक शब्द बता कर अपने आपको बहुत गौरांवित महसूस करते हो। की मैं फलां जाती का हूं, मैं फलां जाती का हूं। इस तरह आप अपने आप को धर्म पालक कहते हो?? अब आप ही विचार कीजिए भारतीयों की तुम सच में अपने धर्म का पालन कर रहे हो??
इसका उत्तर मैं आप के ही ऊपर छोड़ता हूं।
अब कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी हमें ये ही देखने को मिला। महाभारत युद्ध जाती का युद्ध नहीं था, वह धर्म और अधर्म का युद्ध था। पांडव और कौरव थे तो भाई। एक ही ईश्वर में आस्था रखने वाले। परन्तु कौरवों ने धर्म की सारी सीमाएं लांग दी तो युद्ध हुआ और कौरवों का पतन हुआ। साथ में महान भीष्म पितामह, दानवीर कर्ण, गुरु द्रोण भी जो कि पवित्र आत्मा थे वे भी मृत्यु को प्राप्त हुए क्युकी धार्मिक आचरण के होते हुए भी वो अधर्म के पक्ष में थे। और महत्वपूर्ण बात ये है कि श्री कृष्ण भी पांडवों के अर्थात धर्म के पक्ष में थे। अर्थात जहां धर्म है वहां ईश्वर है। तो बताईए भारतीयों क्या आपने अपने धर्म का पालन किया। नहीं ना। क्युकी आप धर्म ही केवल और केवल अपनी जातियों और आस्था को मान बैठे हैं। अब बताईए की कोनसा धर्म है आपका??
और एक बात और कहना चाहूंगा।
"धर्मो रक्षति रक्षितः।"
अर्थात
धर्म का अगर पालन/रक्षा करोगे तो धर्म भी तुम्हारा पालन/रक्षा करेगा। इसलिये भारतीयों पहले अपने धर्म को जानो और उसका पालन करो, तभी तुम्हारी रक्षा होगी। और अब तुम्हे अपना धर्म तो ज्ञात हो ही गया होगा।
मेरा धर्म है मानवता। मेरा धर्म है क्षमा। मेरा धर्म है सभी धर्मों का सम्मान। मेरा धर्म है जीवों पर दया। मेरा धर्म है शरणागत की रक्षा। मेरा धर्म है मातृभूमि की रक्षा। मेरा धर्म है एकता और समरसता। मेरा धर्म है धर्म की रक्षा करना। मेरा धर्म है स्त्रियों का सम्मान करना। मेरा धर्म है निर्बलों की रक्षा करना। और मेरा धर्म है कि धर्म के विरूद्ध कोई अपना व्यक्ति ही क्यों ना हो, उसके भी विरूद्ध हो जाना।अब ये बताईए भारत वासियों आपका धर्म क्या है।??
क्षमा करना परन्तु आपको शायद धर्म के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। क्योंकि किसी भी ईश्वरीय शक्ति और सत्ता को मानना ही धर्म नहीं है। अगर आपकी ईश्वर में श्रृद्धा है तो ईश्वर द्वारा बताए गए धर्म में भी उतनी ही श्रद्धा होनी चाहिए, विश्वास होना चाहिए? सिर्फ ईश्वरीय सत्ता की स्वीकारोक्ति धर्म ही धर्म नहीं है। धर्म का वर्णन में उपर की पंक्तियों में कर चुका हूं। उदाहरण के लिए रावण भी शिवभक्त था, शिव जी की सत्ता को मानता था। तो इसका तात्पर्य ये नहीं हुआ कि वो धर्मी था। माता सीता का अपहरण ही उसके पतन का कारण बना क्योंकि उसने धर्म की सारी सीमाएं तोड़ दी एक पतिव्रता स्त्री का अपहरण करके। और त्रिलोक विजयी करने वाले शक्तिशाली रावण का भी अंत हुआ। क्युकी उसने धर्म के विरूद्ध आचरण किया। शायद अब आप धर्म की परिभाषा समझ गए होंगे। अब बताईए धर्म की परिभाषा क्या है जातिवाद में फसे भारत वासियों। आप किसे धर्म कहते हो?? आप धर्म उस कहते हो जिसको आपने कई जातियों में बांट रखा है?? ये भूल गए आप की धर्म हमेशा एक जुटता और समरसता का संदेश देता है। क्या आपने इसे कभी माना या समझा। क्या आपने धर्म का मर्म समझा?? नहीं समझा आपने धर्म को। और जातियां सूचक शब्द बता कर अपने आपको बहुत गौरांवित महसूस करते हो। की मैं फलां जाती का हूं, मैं फलां जाती का हूं। इस तरह आप अपने आप को धर्म पालक कहते हो?? अब आप ही विचार कीजिए भारतीयों की तुम सच में अपने धर्म का पालन कर रहे हो??
इसका उत्तर मैं आप के ही ऊपर छोड़ता हूं।
अब कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी हमें ये ही देखने को मिला। महाभारत युद्ध जाती का युद्ध नहीं था, वह धर्म और अधर्म का युद्ध था। पांडव और कौरव थे तो भाई। एक ही ईश्वर में आस्था रखने वाले। परन्तु कौरवों ने धर्म की सारी सीमाएं लांग दी तो युद्ध हुआ और कौरवों का पतन हुआ। साथ में महान भीष्म पितामह, दानवीर कर्ण, गुरु द्रोण भी जो कि पवित्र आत्मा थे वे भी मृत्यु को प्राप्त हुए क्युकी धार्मिक आचरण के होते हुए भी वो अधर्म के पक्ष में थे। और महत्वपूर्ण बात ये है कि श्री कृष्ण भी पांडवों के अर्थात धर्म के पक्ष में थे। अर्थात जहां धर्म है वहां ईश्वर है। तो बताईए भारतीयों क्या आपने अपने धर्म का पालन किया। नहीं ना। क्युकी आप धर्म ही केवल और केवल अपनी जातियों और आस्था को मान बैठे हैं। अब बताईए की कोनसा धर्म है आपका??
और एक बात और कहना चाहूंगा।
"धर्मो रक्षति रक्षितः।"
अर्थात
धर्म का अगर पालन/रक्षा करोगे तो धर्म भी तुम्हारा पालन/रक्षा करेगा। इसलिये भारतीयों पहले अपने धर्म को जानो और उसका पालन करो, तभी तुम्हारी रक्षा होगी। और अब तुम्हे अपना धर्म तो ज्ञात हो ही गया होगा।
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