भक्त, भगवान और अभिमान

भगवान समय समय पर भक्तों का उद्धार तो करते ही हैं परन्तु साथ साथ भक्तों के अभिमान को भी इस प्रकार से नष्ट करते हैं कि पुनः उनमें अभिमान के स्थान पर निश्छल भक्ति भावना के अतिरिक्त और कुछ ना रहे। ऐसे ही एक बार श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा, वाहन गरुड़ और उनके अमोघ अस्त्र सुदर्शन चक्र का अभिमान मर्दन किया था। ****

*सत्य भामा को ये अभिमान था कि कृष्ण की सभी पटरानियों में सर्वाधिक सुंदर में हूं।

*गरुड़ को उनकी एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ने की तीव्र गति और बल पर अभिमान था।

*सुदर्शन चक्र को शक्ति शाली और अचूक अस्त्र होने का अभिमान था।

एक दिन प्रभु ने इन तीनों के अभिमान को तोड़ने के लिए मन ही मन एक योजना बनाई और सर्वप्रथम गरुड़ को आदेश दिया कि हिमालय पर्वत पर हनुमान जी तपस्यारत है। उन्हें जाकर लेे आओ।

सुदर्शन से कहा आज तुम बाहर पहरा दो तथा किसी अनजान को अंदर मत आने देना।

सत्यभामा जी से कहा आज हनुमान जी आने वाले हैं तुम शीघ्र ही उनके आने की तैयारी करो।

इस प्रकार सर्वप्रथम गरुड़ हनुमान जी के पास जाकर कहते हैं कि आपको प्रभु ने द्वारका शीघ्र आने का निमंत्रण भेजा है। और गरुड़ ने अभिमान वश कहा आप मेरे उपर बैठे ताकि में आपको शीघ्र ही द्वारका लेे चलूं। हनुमान जी मुस्कुराए और कहा गरुड़ देव आप चलें में आपके पीछे ही आता हूं। गरुड़ जी ने पुनः कहा हनुमान जी में आपको अति शीघ्र ही द्वारका में पहुंचा दूंगा। परन्तु हनुमान जी ने कहा है गरुड़ आप अगर इतना वार्तालाप ना करते तो में अपने प्रभु के पास पहुंच गया होता।आप जाइए में आता हूं।
गरुड़ जी ने द्वारका के लिए उड़ान भरी और रास्ते में सोचते हुए गए की मुझसे पहले केसे पहुंचेंगे। में उनको शीघ्र ही पहुंचा देता उधर हनुमान जी द्वारका पहुंचते हैं और अंदर प्रवेश करते हैं परन्तु सुदर्शन चक्र उनका रास्ता रोक देता है तब हनुमान जी कहते हैं में हनुमान हूं प्रभु ने बुलाया है। परन्तु सुदर्शन चक्र ने जाने नहीं दिया तो हनुमान जी ने उसे पकड़कर अपने मुंह में रख दिया। और महल के अंदर प्रवेश किया। अंदर प्रभु बलराम जी और सत्यभामा जी के साथ बैठे हुए थे। हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम करने के लिए मुंह खोला तो सुदर्शन चक्र बाहर निकला। और लज्जित हुआ। तथा उसका अभिमान चूर चूर हो गया। हनुमान जी वा प्रभु से क्षमा मांग वे बाहर चले गए। तभी सत्यभामा जी को देख कर हनुमान जी ने प्रभु से कहा, है प्रभु माता कहां हैं और आपने किस दासी को उनकी जगह बैठा रखा है। यह सुनते ही रुक्मणि जी प्रवेश करती है और हनुमान जी माता माता पुकार कर उनके चरण छुए। ये देखते ही सत्यभामा का अभिमान भी टूटा। अब हनुमान जी और प्रभु जी वार्तालाप कर रहे थे तभी वहां गरुड़ उपस्थित होते हैं तथा हनुमान जी को उनसे पहले आया हुए देख अचरज में पड़ जाते हैं। उसी समय हनुमान जी कहते हैं गरुड़ देव जी आने में विलम्ब कर दिया। गरुड़ जी समझ चुके थे कि उनका अभिमान हनुमान जी ने तोड़ दिया है।
*इस प्रकार प्रभु जी ने एक भक्त के माध्यम से ही अपने भक्तों के अभिमान को तोड़ा।

लीलाधर की लीला का कोई अंत नहीं है।
हरे राम हरे कृष्णा।

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