मुरलीधर या चक्रधर

विधाता की लीला अपरम्पार है। आदिकाल से ही पृथ्वी श्री हरि और शिव जी की लीला का केंद्र रही है। जब जब पृथ्वी पर अत्याचार बड़ा, तब तब श्री हरि ने अवतार लेकर धर्म की रक्षा की है। हर युग में हरि ने मानवीय मूल्यों की रक्षार्थ समय समय पर अवतार लिया है। ऐसा ही एक अवतार है पर्मावतार श्री कृष्ण का। कृष्ण का नाम सुनते ही मस्तिष्क में हृदय में सर्वप्रथम मुरली, वृंदावन, राधा, गोपियां, माखन, मैया यशोदा, रासलीला आदि विचार उत्पन्न होते हैं। आज भी कोई बालक कृष्ण की पोशाक भी पहनता है तो मुरली और मोरपंख से पहचाना जाता है। ना की सुदर्शन चक्र से। क्युकी कृष्ण = प्रेम है और प्रेम= कृष्ण है।
फिर क्यों वह प्रेम रूपी कृष्ण महाभारत होने देते हैं? क्यों ईश्वर होते हुए भी कृष्ण ये युद्ध रोक नहीं पाए। अब यहां पर कृष्ण के कई रूप है। मुरलीधर प्रेम का प्रतीक। सुदर्शन धारी कृष्ण। सारथी कृष्ण। शांति दूत कृष्ण। यहां कृष्ण कई भूमिकाओं में है। आप किस कृष्ण के पक्ष में हैं। वह कृष्ण जिसे संसार की कोई चिंता नहीं वो तो ब्रजमंडल में अपनी लीलाओं में व्यस्त है। दूसरा वह कृष्ण जो महाभारत की सक्रिय राजनीति को नया आयाम प्रधान करते हैं। तीसरा वह कृष्ण जो अपने मृत गुरूपुत्र को भी काल के मुख से लेे आते हैं या चौथे वे कृष्ण जो काल्यवन से युद्ध में भाग कर रण छोड़ बनते हैं। वे कृष्ण जो जरासंध के रोज रोज के आक्रमण से अपनी जनता को बचाने के लिए मथुरा से द्वारिका जाते हैं। जो युद्ध नहीं चाहते। लेकिन वहीं कृष्ण महाभारत युद्ध में एक आवश्यक भूमिका निभाते हैं। क्यों??

अगले लेख में विस्तार से जानेंगे।

आपका मित्र
ओम सिंधु।


जय श्री कृष्णा
जय हिन्द

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