विश्व गुरु की व्यथा
नमस्कार मैं भारत हूं।
मेरा कभी विश्व पर शासन हुआ करता था। मैं वहीं भारत हुं जिसे विश्वगुरु की उपाधि प्राप्त थी।
वही भारत जिसमें कई महापुरुषों, ऋषियों, मनीषियों, शूरवीरों, देशभक्तों, वीरांगनाओं ने जन्म लिया। मैं वहीं भारत हूं जिसे वेदों का ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। पुरातन और प्राचीन वैदिक धर्म की आधार शिला का साक्षी मैं ही हूं। मैं वही भारत हूं जिसमें सभ्यता सबसे पहले अंकुरित और विकसित हुईं। और उसी सभ्यता को आधार मानकर विश्व बना। मैं वहीं भारत हूं जिसने पूरे विश्व को ज्ञान का अमृत प्रधान किया और जिसकी ज्ञान कि परिधि में पूरा विश्व पनपा। मैं वहीं भारत हूं जिसमें कला सर्वप्रथम जन्मी। कई युगों का साक्षी मैं वहीं भारत हुं जिसने सूर्यवंशी राजाओं का तेज देखा है, जिनके तेज के आगे आकाश में विराजमान सूर्य का तेज भी मंद हो जाता था। ऋषियों और तपस्वियों के ओंकार के नाद से पूरी पृथ्वी को शुद्ध और सरस होते देखा है मैंने। मैने स्वर्ग से भी सुंदर राम का राम राज्य देखा है और कृष्ण की नीति देखी है। वह नीति जिसने भारत में धर्म की स्थापना की। अति गौरवशाली इतिहास का साक्षी हूं मैं। इतना स्वर्णिम इतिहास होने के बाद भी ऐसा क्या हुआ जो मैं आज इतना व्यथित हूं? मैं वही भारत हूं जिसकी मान कि रक्षा के लिए शिवाजी महाराज, महरानाप्रताप, पृथ्वीराज चौहान, गुरु गोविंद सिंह जी, लक्ष्मीबाई, भगतसिंह, राजगुरु, आजाद, सुखदेव, सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर अंतिम सांस तक लड़ते रहे। फिर भी क्यों मेरे टुकड़े होते गए। क्यों तुष्टिकरण के लिए मेरे एक नहीं कई टुकड़े होते गए।भारतवासियों मुझे उत्तर दो, वीरों को पैदा करने के बाद भी क्यों में खंड खंड हुआ? तुमने मेरी रक्षा क्यों नहीं की। अरे मेरी रक्षा तो छोड़ो तुमने तो अपने धर्म की रक्षा ही नहीं की। बंट गए तुम जातियों में। एक धर्म, एक महान वैदिक धर्म को तुमने कई जातियों में कैसे बांट दिया मेरे बच्चों?? जब मेरे टुकड़े हुए तब मुझे बहुत पीड़ा हुई परन्तु मुझे विश्वास था कि मेरे वीर पुत्र मुझे फिर अखंड बना देंगे। परन्तु तुम तो खुद ही जातियों में खंड खंड हो गए।क्यों किया मेरे बच्चों क्यों किया तुमने ऐसा। मेरे टुकड़े ऐसे नहीं होते लेकिन जब तुम खुद बंटने लगे, आपस में लड़ने लगे और विदेशियों को मुझे लूटने और खंडित करने का अवसर मिला। जब जब तुम बंटे तब तब विपदा आयी। इतना कुछ देखने के बाद भी तुम अभी तक नहीं संबले? ये सब देख कर मैं व्यथित हूं बच्चों व्यथित हूं। कई दशकों से पीड़ा सेहन करता हुआ, कई दशकों से व्यथित मैं भारत आज अपने भारत वासियों से एक प्रश्न पूछता हूं कि क्या आप मुझे मेरे पुराने स्वरूप में लौटा पाओगे? इसका उत्तर मैं आप भारतीयों के ऊपर छोड़ रहा हूं। मेरी व्यथा बहुत बड़ी है जो कि कुछ शब्दों में व्यक्त नहीं की का सकती। बहुत समय लगेगा और मैं अपनी पीड़ा का एक एक शब्द आपके समक्ष रखूंगा। और अंत में एक जागृति श्लोक से अपनी पीड़ा के शब्दों पर विराम लगाता हूं। * नमस्कार*
।।जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।- मनु स्मृति
अर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज (ब्राह्मण) बनता है।
मेरा कभी विश्व पर शासन हुआ करता था। मैं वहीं भारत हुं जिसे विश्वगुरु की उपाधि प्राप्त थी।
वही भारत जिसमें कई महापुरुषों, ऋषियों, मनीषियों, शूरवीरों, देशभक्तों, वीरांगनाओं ने जन्म लिया। मैं वहीं भारत हूं जिसे वेदों का ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। पुरातन और प्राचीन वैदिक धर्म की आधार शिला का साक्षी मैं ही हूं। मैं वही भारत हूं जिसमें सभ्यता सबसे पहले अंकुरित और विकसित हुईं। और उसी सभ्यता को आधार मानकर विश्व बना। मैं वहीं भारत हूं जिसने पूरे विश्व को ज्ञान का अमृत प्रधान किया और जिसकी ज्ञान कि परिधि में पूरा विश्व पनपा। मैं वहीं भारत हूं जिसमें कला सर्वप्रथम जन्मी। कई युगों का साक्षी मैं वहीं भारत हुं जिसने सूर्यवंशी राजाओं का तेज देखा है, जिनके तेज के आगे आकाश में विराजमान सूर्य का तेज भी मंद हो जाता था। ऋषियों और तपस्वियों के ओंकार के नाद से पूरी पृथ्वी को शुद्ध और सरस होते देखा है मैंने। मैने स्वर्ग से भी सुंदर राम का राम राज्य देखा है और कृष्ण की नीति देखी है। वह नीति जिसने भारत में धर्म की स्थापना की। अति गौरवशाली इतिहास का साक्षी हूं मैं। इतना स्वर्णिम इतिहास होने के बाद भी ऐसा क्या हुआ जो मैं आज इतना व्यथित हूं? मैं वही भारत हूं जिसकी मान कि रक्षा के लिए शिवाजी महाराज, महरानाप्रताप, पृथ्वीराज चौहान, गुरु गोविंद सिंह जी, लक्ष्मीबाई, भगतसिंह, राजगुरु, आजाद, सुखदेव, सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर अंतिम सांस तक लड़ते रहे। फिर भी क्यों मेरे टुकड़े होते गए। क्यों तुष्टिकरण के लिए मेरे एक नहीं कई टुकड़े होते गए।भारतवासियों मुझे उत्तर दो, वीरों को पैदा करने के बाद भी क्यों में खंड खंड हुआ? तुमने मेरी रक्षा क्यों नहीं की। अरे मेरी रक्षा तो छोड़ो तुमने तो अपने धर्म की रक्षा ही नहीं की। बंट गए तुम जातियों में। एक धर्म, एक महान वैदिक धर्म को तुमने कई जातियों में कैसे बांट दिया मेरे बच्चों?? जब मेरे टुकड़े हुए तब मुझे बहुत पीड़ा हुई परन्तु मुझे विश्वास था कि मेरे वीर पुत्र मुझे फिर अखंड बना देंगे। परन्तु तुम तो खुद ही जातियों में खंड खंड हो गए।क्यों किया मेरे बच्चों क्यों किया तुमने ऐसा। मेरे टुकड़े ऐसे नहीं होते लेकिन जब तुम खुद बंटने लगे, आपस में लड़ने लगे और विदेशियों को मुझे लूटने और खंडित करने का अवसर मिला। जब जब तुम बंटे तब तब विपदा आयी। इतना कुछ देखने के बाद भी तुम अभी तक नहीं संबले? ये सब देख कर मैं व्यथित हूं बच्चों व्यथित हूं। कई दशकों से पीड़ा सेहन करता हुआ, कई दशकों से व्यथित मैं भारत आज अपने भारत वासियों से एक प्रश्न पूछता हूं कि क्या आप मुझे मेरे पुराने स्वरूप में लौटा पाओगे? इसका उत्तर मैं आप भारतीयों के ऊपर छोड़ रहा हूं। मेरी व्यथा बहुत बड़ी है जो कि कुछ शब्दों में व्यक्त नहीं की का सकती। बहुत समय लगेगा और मैं अपनी पीड़ा का एक एक शब्द आपके समक्ष रखूंगा। और अंत में एक जागृति श्लोक से अपनी पीड़ा के शब्दों पर विराम लगाता हूं। * नमस्कार*
।।जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।- मनु स्मृति
अर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज (ब्राह्मण) बनता है।
Bhaut sundar👏
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteNice
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